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Monday, October 31, 2016

भारत में प्रसारण से संबंधित समिति तथा आयोग : एक चर्चा भाग -2

भारत में प्रसारण से संबंधित समिति तथा आयोग : एक चर्चा (भाग -2)
पहला प्रेस आयोग (1952-54)
23सितंबर 1952 को सूचना व प्रसारण मन्त्रालय ने पहले प्रेस आयोग की स्थापना की । जष्टिस जेएस  राजध्यक्ष इसके अध्यक्ष बनाए गए ।
आयोग के सूझाव
- प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने के साथ पत्रकारित के उच्च मान को बनाया रखा जाए । प्रेस काउंसिल की स्थापना हो । इसको स्वीकार कर लिया गया और 4जुलाई 1966 को प्रेस काउंसिल की स्थापना हुई । इसी साल 16 नवंबर से प्रेस काउंसिल ने काम भी करना शुरू कर दिया । इसीलिए हरसाल 16नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
- रजिस्ट्रार आफ न्यूज पेपर आफ इंडिया (आरएनआई) की नियुक्ति हो ।  इस सूझाव को भी ग्रहण कर लिया गया तथा जुलाई 1956 को आरएनआई की नियुक्ति होने लगी ।
- सरकार और प्रेस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की स्थापना ने लिए एक सलाहकार कमेटी का गठन हो । इसे स्वीकार कर लिया गया । 22सितंबर 1962 को एक सलाहकार कमेटी का गठन किया गया. ।
- आयोग के सूझाव के आनुसार  श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम को भी स्वीकार कर लिया गया और 1955 में इसे लागू किया गया ।
- न्यूज एंजेसी तथा अखबारों की आर्थिक हालातों की जांच के लिए फेक्ट फाइंडिंग कमेटी की स्थापना के सूझाव पर 14जनवरी 1975 को इसकी स्थापना हुई ।
दूसरा प्रेस आयोग( 1978)
29मई 1978 को भारत सरकार ने दूसरे प्रेस आयोग की स्थापना की । जष्टिस पीके गोस्वामी इसके अध्यक्ष बनाए गए हालांकि 14जनवरी 1980 को नई सरकार क्षमता में आने के बाद गोस्वामी और उनकी टीम ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया । जष्टिस केके मैथ्यू की अध्यक्षता में 21 अप्रैल 1980 को फिर से प्रेस आयोग की स्थापना हुई ।
आयोग के सूझाव
- सरकार और प्रेस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की स्थापना के लिए कोशिश की जाए ।
- छोटे तथा मध्यम  अखबारों के विकाश के लिए न्यूज पेपर डेवलापमेंट कमिशन की स्थापना होनी चाहिए ।
- अखबार उद्योग व्यावसायिक हित हेतु स्थापित उद्योगों से अलग हो ।
-अखबारों तथा पत्रिकाओं में किसी भी तरह की भविष्यवाणी प्रकाशित न हो ।
-पत्र सूचना कार्यालय का पुनर्गठन हो ।
भारत में प्रसारण से संबंधित समिति तथा आयोग
 Vo Ladki (वो लड़की) By @ItishreeSinghRathaur
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Tuesday, October 18, 2016

अदालत की अवमानना; एक अंतर्दृष्टि चर्चा

अदालत की अवमानना; एक अंतर्दृष्टि चर्चा
बीते अगस्त में आपने नौसेना अधिकारी के. एम नानाबटी की जिंदगी पर आधिरत फिल्म रुस्तम जरूर देखी होगी । उसमें दिखाए गए कोर्ट के दृश्यों में जज एक पत्रिका के संपादक को पहले चेतावनी और फिर चेतावनी न मानने पर सजा सुनाते नजर आते हैं । इन दृश्यों की प्रस्तुतिकरण ने आपको हंसाया भी जरूर होगा लेकिन यह एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है , जिसे अदालती अवमानना कहते हैं । सर्वप्रथम सन् 1926 में न्यायालय की अवमानना का आधिनियम बना था । 26बर्ष बाद 1952 में अदालत की अवमानना संबन्धी नया अधिनियम बना. इस अधिनियम में अवमानना की कोई सुनिर्धारित परिभाषा नहीं दी गई थी । सन् 1961 में गठित सान्याल समिति ने अवमानना अधिनियम पर एक रिपोर्ट पेश की । इस रिपोर्ट और अवमानना अधिनियम पर प्रस्तावित नये दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए सन् 1971में एक नया न्यायालय अवमानना अधिनियम पारित किया गया, जो 24दिसंबर, 1975 में लागू हुआ ।

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अवमानना की परिभाषा
1- किसी न्यायाधीश या जज के खिलाफ निन्दात्मक या विद्वेषपूर्ण वक्तव्य अथवा प्रकाशन द्वारा उसे पद की गरिमा को अयोग्य कहना या लांछन लगाना या उसके पदीय गौरव के खिलाफ आघात करना, या किसी न्यायालय के फैसले खिलाफ निन्दात्मक या विद्वेषपूर्ण वक्तव्य देना अथवा प्रकाशित करना
2- न्यायालय में विचाराधीन मामले के बारे में जनता के मन में भ्रम या पूर्वाग्रह से प्रेरित प्रकाशन
3- न्यायालय में किसी विचाराधीन मामले में जज, पक्षकार, साक्षी पर आक्षेप अथवा उनपर प्रभाव डालने का प्रयत्न करना
4- किसी प्रकाशन के कारण न्यायलय के प्रशासन में हस्तक्षेप या बाधा खड़ी करना
अवमानना के प्रकार
अदालती अवमानना दो प्रकार हो सकते हैं
सिविल
फौजदारी
पहली अवमानना का संबंध किसी निर्णय या निर्देश की अवमानना से है । दूसरी अवमानना का अर्थ लिखे या बोले गए शब्द या संकेत कार्य से है , जो किसी न्यायालय के अधिकार और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है या जिसमें ठेस पहुंचाने की प्रवृति होती है ।
यहां एक बात याद रखने लायक है कि किसी अदालती कार्यवाही की सही और संतुलित रिपोर्ट के लिए किसी व्यक्ति को न्यायालय की अवमानना का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है । न्यायालय के निर्णय के खिलाफ सैद्धांतिक आधार पर संतुलित एवं वेवकपरक टिप्पणी के लिए भी किसी व्यक्ति को न्यायालय की अवमानना के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता ।
अवमानना के लिए सजा
अदालत अवमानना के लिए छह महीने का साधारण कारावास तथा दो हजार रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है । या किसी व्यक्ति को दोनों ही सजा सुनाई जा सकती है । अदालत के समक्ष संतोषप्रद क्षमायाचना की स्थिति में अभियुक्त से सजा से मुक्त किया जा सकता है ।
सजा देने का अधिकार
उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय की अवमानना के लिए न्यायालय को स्वयं उस मामले की सुनवाई करने का तथा सजा देने का आधिकार है । फौजदारी अवमानना के लिए सर्वोच्च न्यायलय या उच्च न्यायालय स्वयं कार्यवाही करने का अधिकारी है , या एेसी कार्यवाही के लिए महाधिवक्ता या महाधिवक्ता द्वारा अधिकृत व्यक्ति के आवेदन की अपेक्षा होती है । अवमानना की तिथि से एक वर्ष के भीतर अवमानना के विषय के कार्यवाही शुरू करने की अवधि है । ( आधार- विधि पत्रकारिता: चिंता और चुनौती, लेखक-पवन चौधरी मनमौजी)